विकास के मॉडल में महिलाएं

घूँघट की जंजीरें तोड़कर, बंदिशों को छोड़कर, उड़ जाने की चाहत है,

तस्वीर बदलनी है जमाने की, अगर बदलने की इजाजत है।

आजमगढ़ के एक छोटे से गांव से जहां से मैं ताल्लुक रखता हूं, लौटते समय जब मैंने अखबार में दिल्ली के जन्तर-मंतर में होने वाली स्लट वॉक के बारे में पढ़ा तो मुझे इस तेजी से होते विकास ने कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। देश में गरीबों अमीरों, गांव शहरों के बीच में तेजी से बढ़ती खाई के बारे में तो दिल्ली के सभी बुद्धिजीवी लगातार बाते करते रहते हैं और ये सच भी है कि हमारे देश के विकास का जो मॉडल है, उसमें गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और ज्यादा अमीर। विकास के इस मॉडल ने गांवों को ही विकसित नहीं किया, बल्कि उन्हें शहर जैसा बना दिया है और जो गांव बच गये हैं, उन्हें हाशिये पर रख छोड़ा है। 

इतने अंतर के बाद भी आजमगढ़ से लेकर दिल्ली तक मुझे एक चीज ऐसी लगी जो ज्यों की त्यों है। वो है समाज में महिलाओं की मानसिक स्थिति। वहां पर उन्हें इतनी बंदिशों में रखा जाता है कि बाहर की दुनिया उनके लिए एक अलग संसार बन जाती है, तो यहां आजादी है, लेकिन इसके मायने ऐसे हैं कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए स्लट वॉक या बेशर्मी मोर्चा निकालना पड़ता है। 

जरा सोचिये, जहां एक ओर आईएमएफ को पहली महिला चीफ मिली और थाईलैंड को पहली महिला प्रधानमंत्री, अपने देश में ही हमें पहली महिला राष्ट्रपति मिली तो पश्चिम बंगाल को पहली महिला मुख्यनमंत्री। देश और दुनिया के विकास के ढ़ाचें में महिलाएं हर जगह खड़ी दिखती हैं, तो ऐसे में अगर देश की राजधानी में वह जंतर-मंतर में अपनी सुरक्षा और पहनावे की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे को लेकर एकत्र होती हैं, तो ये सिर्फ सुरक्षा और शासन के ठेकेदारों के लिए ही नहीं बल्कि हम सबके लिए शर्म की बात है। 

अक्सर मायावती, सोनिया गांधी, जयललिता, किरण बेदी और कुछ गिने चुने नामों को अंगुलियों में गिन कर हम भारत में महिलाओं की स्थिति का खाका तैयार कर देते हैं, लेकिन देश की आधी आबादी में से कुछ नाम सिर्फ समुद्र की कुछ बूंद जैसा ही है। शहरों के लिए भी ये कहना गलत होगा कि महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है, यहां बस रहन-सहन में बदलाव के साथ लाइफ स्टाइल में पश्चिमी सभ्याता का तड़का मात्र लगा है, मानसिक स्थिति तो यहां भी गांवों की चारदीवारी में बंद महिलाओं के जैसी ही है।

इन कुछ नामों का सहारा लेकर महिलाओं की सुधरती स्थिति का गुणगान करने वालों के लिए गालिब की दो लाइनें बहुत फिट हैं कि हमें भी पता है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल बहलाने को ये ख्याल अच्छा है।

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