नई दिल्ली ।। भारत में प्रदर्शनकारी कलाओं की सबसे पुरानी शैली रंगमंच, सुनहले पर्दे के आगे हारती प्रतीत हो रही है। फिल्मों में ज्यादा पैसे, ज्यादा रचनात्मकता के चलते रंगमंच को ज्यादा दर्शक नहीं मिल पाते।
वैसे रंगमंच से जुड़े कलाकार दर्शकों का रुख फिर से इस कला की ओर मोड़ने के लिए इसमें रचनात्मक स्तर पर नवीनता लाने और इसे सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं।
रंगमंच निर्देशक भानु भारती ने हाल ही में 1954 के धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध नाटक ‘अंधा युग’ का मंचन किया था। उन्होंने मंचन के लिए इस नाटक का चयन इसलिए किया कि महाभारत पर आधारित यह नाटक लोगों की यादें ताजी कर उन्हें इससे जोड़ सकता था।
भारती ने आईएएनएस से कहा, “ओपेरानुमा बड़े-बड़े रंगमंच दर्शकों को उनकी रोजमर्रा की चिंताओं से दूर किसी और समय, काल व स्थान पर ले जाते हैं।”
14वीं सदी के फिरोजशाह कोटला किले में 15 से 23 अक्टूबर तक इसका मंचन हुआ, जिसे ढेरों दर्शक मिले।
पिछले सप्ताह राजधानी के सीरी फोर्ट थियेटर में एक पुल्तिजर पुरस्कार विजेता नाटक ‘अगस्त: ओसेज काउंटी’ का मंचन हुआ। ट्रैसी लेट्स के इस नाटक को देखने के लिए भी दर्शकों की अच्छी संख्या थी। संध्या मृदुल, किट्टू गिडवानी, मीता वशिष्ठ, सुचित्रा पिल्लई और इरा दुबे ने इसमें अभिनय किया।
थियेटर के सिनेमा से संघर्ष पर अभिनेत्री मीता ने आईएएनएस से कहा, “मीडिया की असहिष्णुता और पैसे की कमी के चलते बीते सालों के दौरान ललित कलाओं का स्थान सिकुड़ा है। वास्तव में प्रतिभाशाली लोग अब थियेटर कम्पनियों के पास नहीं आना चाहते।”
उन्होंने कहा, “मैंने इस नाटक के लिए अपने ड्राईंग रूम में रिहर्सल की। मैं रिहर्सल के लिए 500 रुपये प्रति घंटा के हिसाब से कोई जगह नहीं ले सकती थी। अच्छी पटकथाएं न मिलना एक और समस्या है।”
वहीं अभिनेत्री सुचित्रा पिल्लई मानती हैं कि देश में रंगमंच शिक्षा का न होना बेकार पटकथाओं की वजह है।
पिल्लई ने आईएएनएस से कहा, “लेखकों के पास नई पटकथाएं विकसित करने के लिए पुस्तकालय और अन्य संसाधन नहीं हैं।”
मुम्बई में दो से नौ अक्टूबर तक ‘शॉर्ट एंड स्वीट’ परियोजना के तहत छोटे-छोटे नाटकों का मंचन हुआ। नए महत्वाकांक्षी लेखकों ने ये पटकथाएं लिखी थीं।
इरा दुबे ने आईएएनएस से कहा, “हमने 20 लघु नाटक मंचित हिए। इनमें से प्रत्येक 10 मिनट अवधि का था।” उन्होंने बताया कि चुनी हुई पटकथाओं में से 70 प्रतिशत भारतीय थीं और उनमें से दो हिंदी में थीं।
आस्ट्रेलिया में 10 साल पहले इस परियोजना की शुरुआत हुई थी। अब दिल्ली में अगले महीने इनका मंचन होगा। फिर चेन्नई और बेंगलुरू में भी मंचन होंगे।
[मधुश्री चटर्जी]














