नई दिल्ली ।। सच में बचपन के नाम से हम सभी के दिल में कुछ-कुछ होने लगता है और हम पुरानी यादों में खो जाते हैं। बचपन एक ऐसी उम्र होती है, जब बगैर किसी तनाव के मस्ती से जिंदगी का आनन्द लिया जाता है। नन्हे होठों पर फूलों सी खिलती हँसी, वो मुस्कुराहट, वो शरारत, रूठना, मनाना, जिद पर अड़ जाना ये सब बचपन की पहचान होती है। सच कहें तो बचपन ही वह समय होता है, जब हम दुनियादारी के झमेलों से दूर अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं।

क्या कभी आपने सोचा है कि आज आपके बच्चों का वो बेखौफ बचपन कहीं खो गया है? आज मुस्कुराहट के बजाय इन नन्हे चेहरों पर उदासी व तनाव क्यों छाया रहता है? अपनी छोटी सी उम्र में पापा और दादा के कंधों की सवारी करने वाले बच्चे आज कंधों पर भारी बस्ता टांगे बच्चों से खचाखच भरी स्कूल बस की सवारी करते हैं।

दिन-प्रतिदिन बच्चों के ऊपर किताबों का बढ़ता दबाव, पुराने ढर्रे पर चलने वाली किताबें तथा बोझिल भाषा ने लगातार बच्चों को किताबों से दूर करना शुरू कर दिया है। इस तकनीकी युग में बच्चें इंटरनेट, टीवी तथा कार्टुन को देखने में अधिक रूचि रखने लगे हैं।

यहां तक कि वह कॉमिक्स पढ़ने के बजाय इन दिनों कार्टून देखना, वीडियो गेम खेलना अधिक पसंद करते हैं। उन्हें अगर कोई किताब अच्छी लगती है भी तो वह उसे इसलिए नहीं खरीदते कि उसके अंदर स्टोरी क्या है। वह उन्हें केवल उसके आकर्षक तथा रंग-बिरंगे कवर को देखकर खरीदते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते समय ने उनकी सोच के साथ उनका लाइफ स्टाइल भी चेंज कर दिया है। वह लांग जंप करने की वजह शॉर्ट जंप करने में विश्वास करते हैं।

रूझान घटने का कारण –

किताबों को पढ़ने में टाइम अधिक लगता हैपढ़ाई का बढ़ता दबावइंटरेस्टिंग लैंग्वेज का न होनाकिताबों का पुरानी पद्धति पर लिखा होनाआधुनिक तकनीकी का आना हर काम में रहती है जल्दबाजीमॉडर्न स्टाइलऑन लाइन गेम्स

ऐसे बढ़ सकता है रूझान –

लर्न बाइ फन स्टाइल में हों किताबेंलैंग्वेज हो चटपटीस्टाइल तथा पैटर्न मॉडर्न कल्चर पर आधारित होलैंग्वेज बोझिल न हो

बच्चों पर पड़ता पढ़ाई का दबाव
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