peacock dance
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बांदा ।। ‘जंगल न होते तो मोर कहां छिपते..?’ यह कहावत सच साबित हो रही है बुंदेलखण्ड में। यहां कभी घने जंगल हुआ करते थे। अब न जंगल बचे न मोर। बाग-बगीचों में इस राष्ट्रीय पक्षी की मधुर आवाज सुनने और नृत्य देखने को लोग तरस गए हैं।

त्रेता युग में भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में मोर पंख सुशोभित होता था और भगवान श्रीकृष्ण अक्सर मोरों की मौजूदगी में ही राधा संग रासलीला रचाते थे, ऐसा उल्लेख मिलता है।

इस खूबसूरत पक्षी पर ग्रामीणों की अपनी अलग आस्था है। लोगों का मानना है कि इसके पंख से प्रेत बाधाएं दूर होती हैं। लिहाजा लोग घर-आंगन के अलावा चारपाई के सिरहाने पर भी मोर पंख रखते रहे हैं।

बुंदेलखण्ड की स्थानीय भाषा में नर पक्षी को मादा (पुछार) और मादा को नर (मुरैला) कहा जाता है। मोर (नर) अपने कुनबे के साथ श्रीकृष्ण और गोपिकाओं की तरह रहने के आदी होते हैं। यानी, एक नर पक्षी कई मादा (मोरनी) पक्षियों के झुंड में रहना पसंद करता है।

सावन की फुहारी बरसात में नर पक्षी मादा को रिझाने के लिए जंगल में नृत्य करता है, उस वक्त मादा नृत्य कर रहे नर के चारों तरफ चक्कर काटती है और नृत्य के दौरान नर के मुंह से निकले झाग को खाकर मादा गर्भ धारण करती है।

इस तरह मोर अपने कुनबे को बढ़ाता है। इतना ही नहीं, अक्सर पेड़ों की डाल पर बसेरा करने वाली मादा जमीन पर अण्डे देती है और बच्चों की रखवाली व पालन का कार्य नर ही करता है।

मध्य प्रदेश की सीमा और केन नदी की तिरहार में बसे पनगरा गांव के बलराम दीक्षित ने बताया, “एक दशक पूर्व इस इलाके में मोर बहुतायत संख्या में पाए जाते थे। अब इनकी संख्या कम हो गई है। एक समुदाय विशेष के लोग अंधाधुंध शिकार भी करते हैं। पहले तो घरों के आंगन में मोर आ जाते थे, अब बाग-बागीचों में भी नजर नहीं आते।”

आयुर्वेद चिकित्सा का भी मोर से गहरा सम्बंध है। चिकित्सक डॉ़ महेन्द्र सिंह का कहना है कि वैसे तो मोर का हर अंग दवा के काम आता है, लेकिन मोर पंख से उल्टी की दवा बनाई जाती है।

सारस की भांति मोर को भी किसानों का मित्र कहा जाता है। इसकी आवाज मात्र सुनकर जहरीले सांप खेत-खलिहानों से दफा हो जाते हैं। वैसे जहरीले सांप इस पक्षी के पसंदीदा भोजन हैं।

मोरों की घटती संख्या का मुख्य कारण वनों की अवैध कटाई माना जा रहा है। पहले बुंदेलखण्ड की अधिकांश धरती घने वनों से आच्छादित थी। अब पहाड़ों पर सूखी चट्टानों के सिवाय कुछ भी नहीं बचा है। पहाड़ों पर भी माफिया हावी हैं। खनन से पहाड़ों का अस्तित्व खतरे में है।

बुजुर्ग कहावत कहा करते थे कि ‘जंगल न होते तो मोर कहां छिपते, साधु न होते तो चोर कहा छिपते’ साधुओं की संख्या तो दिन पर दिन बढ़ रही है, लेकिन जंगलों का सफाया होता जा रहा है। यही वजह है कि लोग इस राष्ट्रीय पक्षी के दर्शन को तरसने लगे हैं।

बांदा में वन विभाग के अधिकारी को तो जंगली जानवरों व पक्षियों के बारे में कुछ पता नहीं है। वन अधिकारी (डीएफओ) नूरुल हुदा ने कहा कि मोरों की निश्चित संख्या का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। गणना कराने की योजना बनाई जा रही है।

क्यों नहीं नाचते अब बागों में मोर ?
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